देना ना मुझको ज़हर… दे दो मुझे दाल-ऐ-अरहर
खातें हैं इसे जोशी मनोहर, कैफ मोहम्मद और मोहम्मद अज़हर
मेस में थी मेरी खाली कटोरी… किसी ने उसमें भर दी दाल पूरी
स्वर्ण चंपा सी थी वह पीली… मन मोहिनी मादक मन रसीली
नूर-ऐ-लुत्फ़ हमें आने लगा… जब दाल-ऐ-अरहर का स्वाद दिल पे छाने लगा
जब हुआ दाल-ऐ-अरहर और चावल का संगम… चक्षु के समक्ष प्रकट हुआ एक द्रिश्य विहंगम
देना न मुझको ज़हर, दे दो मुझे दाल-ऐ-अरहर
how can i forget that….we were sitting in the boring lecture of DSP…and suddenly an idea came. that evolved into this masterpiece…..:) DAAL-E-ARHAR WAH WAH…LAJAWAAAABBBB
hats off